पितृ दोष:

जातक की कुण्डली में नवें (धर्म स्थान) पर पाप गृह जैसे राहु शनि का होना पितृ दोष का करक होता है। पूर्व जन्म में पूर्वजों या गुरु की अप्रसन्नता अथवा उनके प्रति प्रतिकूल आचरण इस दोष के मूल में निहित है।

पितृ गायत्री :- 1,25,000
दशांश हवन (With Samagri):- 1,25,000

पितृ दोष निवारणं
(श्रीमदभागवद का मूल पाठ)

कैसे बनता है:

पूर्वजों के प्रति यथोचित ज़िम्मेदारियों के निर्वाहन में असफलता।

लाक्षणिक संकेत:
१/ वंश वृद्धि में गंभीर अवरोध
२/ धन हानि
३/ अपयश की प्राप्ति
४/ मानसिक विचलन
५/ परिवार में मांगलिक कार्यों का आभाव

पितृ दोष पूजा के प्रकार:

१/ पिण्डदान
२/ पितृ तरपान
३/ नारायण बलि
४/ षोडशी
५/ त्रिपिंडी श्राद्ध
६/ माध्यम षोडशी
७/ वार्षिक श्राद्ध
८/उत्तम षोडशी
९/ नाग बलि
१०/ पितृ गायत्री
११/ तेहरवीं शांति

निवारण के उपाय:

१/ पित दोष शान्ति स्थान पर विशेष होती है। प्रमुख स्थान:- बोधगया (बिहार) बद्रीनाथ (उत्तराखंड), कुरुक्षेत्र, हरिद्वार , प्रयागराज इत्यादि है।

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